ग़ज़ल
खाली पहाड को बर्फानी मत लिख ,
सूखी नदी को भरी पानी मत लिख ।

हम जो सह गये चुप चाप सब कुछ ,
उस को हमारी नादानी मत लिख ।

हो गया झूठ हमारा सच कहा ,
झूठ को सच की कहानी मत लिख ।

गिरी मुदरी मिरी उठा ली जो तूने ,
उसे मेरी दी निशानी मत समझ ।

फैसले को कचहरी लगेगी देखना ,
इसे दीक्षित की हुक्मरानी मत लिख ।
सुदेश दीक्षित

ग़ज़ल

मौत मेरी तुम्हे खींच कर लाएगी ,
तुम न चाहो तो भी रूलाएगी ।

खींच लिए पांव क्यों तूने राहे बीच,
साथ चल न पाने की कसक सताएगी ।

मै नहीं पर लगता है तुम ही ,
दिले दास्तां जहां को बताएगी ।

होगा न कोई शिकवा मुख पर ,
नकाब मेरे मुख से हटाएगी ।

होगा नहीं गिला होंठो पे दीक्षित के,
नही तो बात सरे आम हो जाएगी ।

सुदेश दीक्षित