ग़ज़ल/संजीव सुधांशु

गजल
सरे आइना खुद को ही पहचान नहीं पाया मैं,
अब तलक खुद को ही जान नहीं पाया मैं |
वो निगाहों में ही इकरार किया करते थे,
उस निगाहे यार को ही पहचान नहीं पाया मैं |
खुल्द से आदम को निकालना तो ठीक था,
जहाँ में क्यों बसा दिया, यही जान नहीं पाया मैं |
मेरे चमन को सेहरा कर शायद वो खुश हैं,
दोस्तों में दुश्मनों को पहचान नहीं पाया मैं |
इस शहर की आबोहवा इतनी दूषित हो गई है,
चमन जो सब्ज था कभी उसे पहचान नहीं पाया मैं |
अपने औ’ दूसरों से बहुत से वादे किये थे सुधांशु,
पर किसी भी वादे को निभाने की ठान नहीं पाया मैं |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डाकघर च्वाई
त. आनी जिला कुल्लू (हि. प्र.)
94182-72564

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