चेहरे पर मुस्कान नहीं

आज भविष्य देश का
सडकों पर विखरा पड़ा है
ज्वलंत प्रश्न सामने है
समाज फिर भी सोया पड़ा है।

कोई देखता नहीं, सोचता नहीं
कुछ करता नहीं न ठानता है
स्वयं का जीवन सुखमय हैं
औरों के दु:ख पहचानता नहीं।

कलम भी तो अपने गुण गाती
दबे कुचलों की परवाह कहां
भाग्य जिनका साथ नही है
उनके लिये अब आह कहां।

नंगे है, भूखे है, विमार हैं
कौन इनको अब दे सहारा
जियें यहां सब अपने लिये
कर लें झट इनसे किनारा।

इनकी आँखों से झरते हैं आँसू
इनके चेहरे पर मुस्कान नही है
बदकिस्मत है समाज सखा वोह
जहां बच्चों को अक्षर ज्ञान नहीं है ।

मर चुकी है मानवता
या फिर हमने मार दी है
पीर इन मजलूमों की हमने
सदैव के लिये विसार दी है।

हम घरों में पकवान बनायें
यह खरोलें कचरे का ढेर
कब फिरेंगे दिन इनके
क्या आयेगी एसी सवेर।

क्यूं रहें यह भूखे नंगे
क्या इनका कोई कसूर है
कोई नहीं जो सुध ले इनकी
क्यूं खुदा भी इनसे दूर है।

अपने लिये बहुत कर लिया
कूछ इनके लिये भी कर लो तुम
एसा न हो यह भविष्य हमारा
निराश हो जाय आँखों से गुम।।

सुरेश भारद्वाज निराश♨
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