कविता मैं औरत हूं/सोनिया दत्त पखरोलवी

कविता —-मैं औरत हूं

तोड़ना चाहती हूं बंधनों को
काटना चाहती हूं बेड़ियों को
दफ़न करना चाहती हूं कुरितियों को
जलाना चाहती हूं उन किताबों को
जिनमें किया है खून मेरे ख़्बावों का
रोका कुछ सोचने समझने से
दबाया हरपल मुझे
लिखा इतिहास मेरी गुलामी का
काट दिया मेरे परों को
न दी कभी आजादी पुरूष के बराबर

मैं औरत हूं…….

मैंने सही यातनाएं कयी
जानती थी मैं
मांगना न पड़ता कभी
जल नदी से ,सूरज से धूप
पेड़ से फल ,गगन से हवा
धरा से शरण, मां से प्यार
मगर मैंनें हर रिश्ते को मांग कर निभाया
मैं औरत हूं…….

सुबह उठते ही मुझे चिढ़ाते
खाली होते चायपत्ती,दाल,तेल,नमक के डिब्बे
डराता है मुझे आट्टे का बर्तन
पति की कमीज का टूटा बटन
सताती बेटे की छोटी होती पैंट
और बेल सी बढ़ती बेटी की जवानी

खौफ पैदा हो जाता देख कपड़ों के ढेर
कानों में बजते रहते जूठे बर्तन सांझ सबेर
सब सहती न कुछ कभी कहती

मैं औरत हूं……
तवे पर सिकते फुल्के के सिवा
कौन सुनता है मेरे दिल की
वही जानता है रंगीनियां हैं सभी के वास्ते
मेरे लिये है ग़म की दास्तां
रौशनी और रौनकें हैं औरों की
मेरे पास है घुटन और धुआँ
बना ली हैं औरों ने प्यार की इमारतें
मेरे नाम होता उजड़ा आशियां
उमर भर ढोती मैं बोझ रिश्तों का
छलनी होता मेरा दिल सुन शिकबे ,शिकायत
करती हूं मैं सहन प्रसव पीड़ा को
मैं औरत हूं….

जानती हूं निभाना अपना धर्म
चलाती हूं घरबाहर,दोनों ही कर्म
झुलसा कर अपना सुख चैन
जागती रहती दिन रैन
काटती हैं मुझे बाज, कौए ,चील सी आंखें
फिर भी मैं चलती हूं
लेकर चहरे पर एक झूठी हंसी
फीकी ही सही
मगर एक हंसी

मैं औरत हूं……

सोनिया दत्त पखरोलवी
गांव ,पखरोल, डाक सेरा जिला हमीरपुर

9 comments

  1. कया बात सोनिया जी सुनदर रचना के लिये बधाई।

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