ग़जल

दिल पे बड़ी चोट खाये हुए हैं
खुदा हम तिरे भी सताये हुए हैं।

पूजा है हमने तुझे मंदिरों में,
सुबह शाम घंटी बजाये हुए हैं।

वक्त पे दुश्मन ही काम आयें
दोस्तों को तो आजमाये हुए है।

किसी ने किसी कोअपना बनाया
हम तुझे ही दिल में बसाये हुए हैं।

पत्थर की दुनियाँ है पत्थर सरीखी
हम खुद को यूँ ही पिघलाये हुए है।

वक्त हमको कभी रास आया नहीं
वखूवी दिल को समझाये हुए है।

न जिन्दगी हंसी न हम हंस पाये
बस तेरे लिये मुसकाये हुए है।

आसां नहीं अब जीने की राहें
हम खुद ही कंकड़ बिछाये हुए है।

अब कैसे बताओ हिम्मत संजोयें
हम वक्त के भी डराये हुए हैं।

वो सुरमयी नगमें कहां से सुनें
साज टूटे हुए हम बजाये हुए हैं।

पैरों के छाले अब फटने लगे है
चप्पल नयी इक मंगबाये हुए है।

बहुत बढ़ गयी है पीड़ अब दिल की
अपनी चीखों पे काबू पाये हुए है।

दिल जल रहा है रुह जल रही है
तेरी याद को भी भुलाये हुए हैं।

तेरे लिये अब क्या कर सकेंगे
हम खुद बोझ अपना उठाये हुए है।

कहां जा के खोजें नसीव वो अपना
निराश जो किस्मत के ठुकराये हुए है।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पी ओ दाड़ी, धर्मशाला हिप्र.
176057
मो० 9418823654