ग़ज़ल/लक्ष्मण दावानी

मेरे मोहब्बत का गर तू खुदा नहीं होता
सर मेरा तेरे सजदे में झुका नहीं होता

रोज आजमाते हो मोहब्बत में मुझे तुम
हर कोई ज़माने में बेवफा नहीं होता

बे वफाई करके तुम रोज दिल दुखाते हो
दिल लगाने का तुमसे हौसला नहीं होता

साथ दोगे क्या मुसीबत में तुम कभी मेरी
देख के फासले तेरे फैसला नहीं होता

खेलते रहे दिल से बस समझ खिलौना तुम
काश तुम्हे दिल मैंने ये दिया नहीं होता

टूट के बिखरता ये कैसे दिल मेरा जानम
गर ये तेरे हाथो से जो गिरा नहीं होता
( लक्ष्मण दावानी ✍ )

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *