भयभीत मैं”

सुबह-सवेरे डर जाता हूँ,
मानो थोड़ा मर जाता हूँ।
थर्रा जाता है मन-मंदिर ,
हालत पतली कर जाता हूँ।।

बाॅस दिखाए शक्लें अपनी,
बीवी बाँटे अक्लें अपनी।
कुछ पर मैं कुछ मुझ पर भारी,
खूब हिलाएँ टक्लें अपनी।।
नाच-नचनियां जैसे नाचूँ,
देखो यार सिहर जाता हूँ।।….
थर्रा जाता है मन-मंदिर ,
हालत पतली कर जाता हूँ।
सुबह-सवेरे डर जाता हूँ,
मानो थोड़ा मर जाता हूँ।।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ी है,
हिम्मत अपनी सुस्त पड़ी है।
मँहगाई मुँह खोले ऐसे।
देख मुसीबत और बढ़ी है।
माँग बढ़ी है दिन-दिन फिर भी,
थोड़े ही में सर जाता हूँ।।
थर्रा जाता है मन-मंदिर ,
हालत पतली कर जाता हूँ।
सुबह-सवेरे डर जाता हूँ,
मानो थोड़ा मर जाता हूँ।।

चावल-दाल मिलावट भारी,
नकली फूल सजावट सारी।
हसना-रोना झूठ हुआ है,
मानवता ने बाज़ी हारी।।
नकली भाव सजे मुख-मंडल,
जाने किधर-किधर जाता हूँ।।
थर्रा जाता है मन-मंदिर ,
हालत पतली कर जाता हूँ।
सुबह-सवेरे डर जाता हूँ,
मानो थोड़ा मर जाता हूँ।।

दान-दहेज हुए दानव हैं,
मानव के दुश्मन मानव हैं।
जाल विशाल फँसाते सबको,
तरकीबें सब नव-अभिनव हैं।।
इन तरकीबों से बचने को,
सच्च में देख बिखर जाता हूँ।
थर्रा जाता है मन-मंदिर ,
हालत पतली कर जाता हूँ।
सुबह-सवेरे डर जाता हूँ,
मानो थोड़ा मर जाता हूँ।।

ढोता जब तक तब तक ढोई,
ठौर-ठिकाना अब ना कोई।
भीतर बाहर अंधेरा है,
कैसे दर्शन-हर्षण होई।।
मुक्ति मिलेगी कैसे मुझको।
अंधा कूप उतर जाता हूँ।।
थर्रा जाता है मन-मंदिर ,
हालत पतली कर जाता हूँ।
सुबह-सवेरे डर जाता हूँ,
मानो थोड़ा मर जाता हूँ।।

नवीन शर्मा ‘नवीन’
गुलेर-कांगड़ा(हि०प्र०)
१७६०३३
?9780958743