आजादी आ गई?

कल सपने में मेरे,
आजादी आ गई।
पता नहीं कितने,
जख्म दिखा गई।
कितने दुखड़े सुना गई।
बैसे मैं जन्म पर ही,
अपने लहू से नहाई थी।
अपने जिस्म को दो टुकड़ों में,
बांटकर बजूद में आई थी।
मैंने सबको खुशहाल भारत का,
सपना दिखाया था।
मेरे इसी वायदे की बदौलत,
शहीदों ने सबकुछ लुटाया था।
मगर इतने साल,
बीत जाने पर भी;
मैं अपने-आप को,
असहाय पाती हूं।
किसान और मजदूर का,
हक दिला नहीं पाई हूं।
शहीदों से किया वायदा,
निभा नहीं पाई हुं।
नित-नये घोटाले सामने आते हैं,
मेरा सीना छलनी कर जाते हैं।
बहुवलियों का सियासत में,
बोल-बाला हो गया है।
उसूल बाला आदमी,
न जाने कहाँ खो गया है।
नीतियां सब स्वार्थसिद्धी,
का साधन हैं।
सम्पन्न वही है,
जिसके पास काला-धन है।
संसद का सम्मान कम हो रहा है।
लोकतंत्र प्रासंगिकता खो रहा है।
प्रजातंत्र के मन्दिर में,
शिष्टता का नाम नहीं है।
लड़ाई-झगड़े, आरोप-प्रत्यारोप,
के सिवा कोई काम नहीं है।
गरीब की समस्या पर,
चर्चा के लिए वक्त नहीं है।
देश-द्रोहियों के लिए,
कानून सख्त नहीं है।
चाटूकारिता के सामने,
ईमानदारी मुह की खा रही है।
हलांकि कुछ बातों पर,
मैं इठलाती भी हुं।
युद्धों में मेरे सपूतों ने,
शत्रु को नाकों चने चबाये हैं।
मेरे कई सपूतों ने,
नोवेल पुरस्कार भी पाये हैं।
मुझे परमाणु संपन्नता दिलाई है।
चिकित्सा के क्षेत्र में डाक्टर पुत्रों को बधाई है।
मगर जब मेरा गरीब बेटा,
रोटी के लिए रोता है।
बचपन पाठशाला न जा कर,
ढावे पर बर्तन धोता है।
जनता के जान-माल की,
रक्षा नहीं हो पाती है।
बहु-बेटियों की इज्जत,
सरेआम लुट जाती है।
इन सब पर नेता,
अपनी रोटियां सेकते हैं।
स्वार्थ के लिए गुनाहगारों के,
आगे घुटने टेकते हैं।
अब इन भेड़ियों पर,
बिश्वास नहीं रहा है।
इनके कारण देश ने,
क्या-क्या नहीं सहा है।
स्वयं की लाचारी पर,
वह रो रही थी।
और मुझे भी,
रुला गई।
कल सपने में मेरे,
आजादी आ गई।
……….
गोपाल शर्मा,
जय मार्कीट, काँगड़ा।
हि.प्र.।
09816340603