बड़ा सा काटा

गुजरती हुई रेलगाड़ी को
देखता हूँ आशा भरी नज़र से
देखता हूँ पास से गुजरते डिब्बों को
डिब्बों के अंदर बैठे /
प्रत्येक व्यक्ति को।
बहुत कोशिश करता हूँ
आँख टिकाने की ।
परन्तु / मेरी आशा से
कहीं अधिक है
रेल की गति
या उस इंजन की शक्ति/ शायद
जो ले जाता है
तेज़ी से खींच कर
पूरी रेलगाड़ी को
प्रत्येक डिब्बे को
अंदर बैठे प्रत्येक व्यक्ति को ।
और मुझे दिखाई देता है
आख़िरी डिब्बे के पीछे बना
बड़ा सा काटा
जो मुझे लगभग चिढ़ाता सा
अंगूठा दिखाता सा
हल्के हल्के ठुमके लगाता
करते हुए टाटा
अगले ही मोड़ पर
ओझल हो जाता है !
—भूपेन्द्र जम्वाल ‘भूपी’
नगरोटा बगवां , कांगड़ा