विवश धूप

उनका मिलना
जैसे धूप का खिलना
देता है सुखद अनुभूति
माघ की ठिठुरन में।
जब छंटते हैं धुंधलके
चीरकर अँधेरे को
हट जाती है शिकन
फैलती है मुस्कान
बिखरता है प्रकाश।
मिट जाते हैं
मतभेद/मनभेद सभी।
लगे खुल जाएगा मौसम
सदा के लिए ;
न अवरोध
न धुंधलका।
विश्वास जगाती है धूप
सब साफ़ साफ़ होने का/
उजास होने का।
धूप भी है मगर/
विवश सी;
चलती है एक ही सीध
और
दाएं बाएँ रह जाते हैं /
कुछ कोने अँधेरे।

–भूपेन्द्र जम्वाल ‘भूपी’
नगरोटा बगवां , कांगड़ा
9805936485
9418036485