ग़ज़ल

तुम बनों साकी थे सजदे हमने किए I
जाम गैरों को तो अशक हमने पिए II

लड़खड़ाते ना शराब पी कर भी हम ,
जाम जितने चाहो तुम पिला दीजिए I

इक नजर भर का सिला दो हम को सनम ,
हो नशा बेजा तो भी करम कीजिए I

दी कसम तो प्यार की न इजहार कर ,
फरफराते रिन्द होंठ हमने सिए I

तोहमत फिर से वही है हम पे लगी ,
जाम भर भर ओरों को कि अपने दिए I

दौर –ए –मय में जाम ही खनकते रहे ,
हम तो बैठे सुबह तक थे उनके लिए I

है सहारा उम्र भर उन्हीं लम्हों का ,
साया-ए-गेशू में तेरे जो ‘कंवर’ जिए I

डॉ . कंवर करतार
‘शैल निकेत’ अप्पर बड़ोल दाड़ी
धर्मशाला I
9418185485