उन की कुछ तो हुई होगी बात
इतना करते वे क्या थी औकात

बादल भी समुद्र से पानी लेकर
नीले गगन से करते हैं बरसात

चांद सूरज की गर्मी में तप कर
रोशन करता है घनी काली रात

उम्मीद रख सकते हो जितनी रखो
उम्मीदों पर ही टिकी है कायानात

दूसरों पर अंगुली कम ही उठाओ
जब भी करो, करो अपनी ही बात

खुदा साथ है तो क्या करेंगे दुश्मन
राह में चलें वे चाहे हजारों बिसात

संकल्प से आगे बढ़ता चल ‘रविन्द्र’
क्या करेंगे दुश्मन, कितनी है औकत
रविन्द्र अत्रि