ज़बान में लज़्ज़त है और लिबास में लजाजत… Created By Susheel Bharti

ज़िन्दगी में रौनक लाई ऐसे,
ब्यां अब मैं करूं कैसे?
आकर दिल में आहिस्ता- आहिस्ता,
मानो आभा बिखेर रहा माहताब जैसे।
कमल भी शरमा रहा देखकर उसकी नज़ाकत।
उसकी हर अदा है काबिले तारीफ,
ज़बान में लज़्ज़त है और लिबास में लजाजत।।

सादगी में उसकी हो गया गुरूब अब तो,
दिल को वही शख्स भाता खूब अब तो।
हो गया मैं धनवान यारो,
पाकर लाख टके का महबूब अब तो।
दिल में मेरे बसर है करती इक अनमोल अमानत।
उसकी हर अदा है काबिले तारीफ,
ज़बान में लज़्ज़त है और लिबास में लजाजत।।

शर्म ओ हया से नज़र जब उठाई उसने,
चोरी से निगाह जब मिलाई उसने।
उसकी लियाकत ने कर दिया घायल,
आँखों से जब पहली मरतबा पिलाई उसने।
इश्क के कीड़े है दिलो दिमाग में बहुत दूर गलाज़त।
उसकी हर अदा है काबिले तारीफ,
ज़बान में लज़्ज़त है और लिबास में लजाजत।।

बड़ी फुरसत से खुदा ने उसको संवारा,
ज़मीन पे है उतर आया आसमां का तारा।
पल भर के लिए दिल को भस्म है कर जाता,
वो तो है यारो आग का अंगारा।
दिल भी कोमल फूलों सी है उसकी नज़ाकत।
उसकी हर अदा है काबिले तारीफ,
ज़बान में लज़्ज़त है और लिबास में लजाजत।।

रचनाकार– सुशील भारती, नित्थर, कुल्लू ( हि. प्र.)