ग़ज़ल

मेरी भी कुछ तो खबर कर या खुदा
रहमतों की इक नजर कर या खुदा

खो न जाऊं मैं जहाँ की भीड़ में
अपने होने का असर कर या खुदा

हो ग़मों की तलखियां हों खुश जो पल
पाक मेरा तू बसर कर या खुदा

तपते रिसते जिस्म के छालों पे तू
इक सबा का तो शजर कर या खुदा

आरजू के ख़्वाब सारे हैंं धुआँ
उजड़ी बस्ती को नगर कर या खुदा

चलते चलते रूह भी दरहम हुयी
अब मुकम्मिल यह सफर कर या खुदा।

मोनिका शर्मा सारथी