पैसा”
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ज़रा सोचो वक़्त आ गया कैसा,
इनसानियत बिक रही ,
सब कुछ हो गया पैसा…..!

भाई भाई लड़ जाते,
रिश्ते तार तार कर जाते,
अपनों को अपने मार जाते,
चाहे बाप हो चाहे बेटा,
इनसानियत बिक रही,
सब कुछ हो गया पैसा….!

हर जगह दलाल है,
ग़रीबों का बुरा हाल है,
हर इक रिशवत की,
ताक में रहता..
इनसानियत बिक रही,
सब कुछ हो गया पैसा…!

दौलत वालों का हो गया दबदबा,
दौलत वालों की हो गई नौकरी,
ग़रीब बेचारा दर दर भड़के ,
राह देखे मौत की,
इन्सान ये तेरा हाल कैसा,
इनसानियत बिक रही,
सब कुछ हो गया पैसा…!

अपनों से अपना लड़ जाए’
मारने को पड़ जाए’
रिश्तों का मुल न देखा’
इनसानियत बिक रही,
सब कुछ हो गया पैसा…!

दौलत से सब रिश्ते नाते,
दौलत वाले सबको भाते,
दौलत से काम फट हो जाते,
ग़रीबों से अन्याय कैसा,
इनसानियत बिक रही,
सब कुछ हो गया पैसा..!

इनसानियत रखो दिल में,
कुछ नहीं है पैसा,
साथ में ये जाएगी
बाक़ी सब यहाँ रहता..!

उत्तम सूर्यवंशी
गाँव तलाई डा. किलोड
ते. सलूनी ज़िला चंबा (िह.प.)
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