ग़ज़ल/राकेश मल्होत्रा

जो अपने थे आज हुये बेगानों से
ठेस लगी है यूं दिल को यारानों से

झूम उठी है महफ़िल जिनकी आमद से
बैठे हैं वो बने हुये अन्जानों से

प्यार बदौलत इनके ही तो ज़िन्दा है
लगते हैं जो लोग हमें दीवानों से

ख़्वाब हुये वो दिन वो रातें प्यार भरी
जीवन के वो दिन हैं अब अफ़्सानों से

छोङ आये हैं दिल को जाने किस बस्ती
नगरी नगरी फिरते हैं दीवानों से

ख़ौफ़ भला क्या मौत का हम दीवानों को
सीखा हमने जल जाना परवानों से

प्यार भरा संदेश हमें फैलाना है
बचना होगा पर ‘नुदरत’ शैतानों से

©राकेश मल्होतरा ‘नुदरत’

2 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *