कविता

मन पर बस नहीं चलता
तन का बस भी खोने लगा है
ईश्वर की यही माया है
जो नहीं चाहा वोह होने लगा है

फूल भी अक्सर मुर्झाते हैं
ईन्सानों की तो विसात क्या
उसकी कृपा गर हो जाये
अच्छ बुरे फिर हालात क्या।

जो बांटा है वोह तो मिलना है
कर्मों का ही यह खज़ाना है
निकलेगा तो जरुर डूबेगा भी
क्यूं सोच सोच कर पछताना है

आत्मा कहे आ चल पड़ते हैं
मन कहे छोड़ रुक जाते हैं
हालात कहें यहीं भोग लो
उसकी सत्ता में झुक जाते है।

पराया सा लगता है सब कुछ
अपना आप भी अपना नहीं
एक सत्य है बस याद मुझे
व्यर्थ में मुझे यूं खपना नहीं।

इच्छाऔं को अब मरना होगा
दिन दिन ढलती इस शाम में
उतना ही निराश चले खिलौना
जितनी चाबी है भरी राम ने।

सुरेश भारद्वाज निराश?
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
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