“इतनी सी ज़िंदगी ”
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सपनों जैसी है ,
ये ज़िंदगी,
आँख खुली के
रूक जाती है..!

बत्ती जैसी है
ये सांसे ,
तेल ख़त्म तो,
बूझ जाती है..!

मतलब की है.
ये दुनिया ,
काम निकला
के भूल जाती है…!

काग़ज़ की काशती है
ये ज़िंदगी ,
हवा लगे तो
उड़ जाती है…!

ऐ”उत्तम ” हंस कर
रह हमेशा ‘
ये दुनिया की
चीज़ें हैं,
दुनिया में
रह जाती हैं…!

मुहब्बत की डोर पकड़,
किसी से न अकड़
इक नेकी तो
साथ जाती है…!

इक दिन मौत,
आती है,
इन सब का एहसास,
दिलाती है,
सपनों जैसी ज़िंदगी
आँख खुली तो
रूक जाती है…!

उत्तम सूर्यवंशी
गाँव तलाई डा. किलोड
ते. सलूनी ज़िला चंबा (िह.प.)
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