ग़जल

जिधर देखूँ उधर मुझे ललकार सुनाई देती है
अपने आँगन में मुझको दीवार दिखाई देती है।

जीना भी क्या जीना है सांसों की निगरानी है
रुकती सांसों में धड़कन लाचार दिखाई देती है।

मुहब्बत रिश्ता मिट जाये केवल तीन लफ्जों में
जिसे देखो जीह्वा पर तलवार दिखाई देती है।

जितनी मर्जी मेहनत करे किसान अपने खेतों में
लहलहाती फसल में खरपतवार दिखाई देती है।

काली धौली शिखरों पर बर्फ के फाहे दिखते है
मैदानों में भी कुदरत वफादार दिखाई देती है।

जैसी करनी वैसी भरनी कहावत बड़ी पुरानी है
करे कोई भरे कोई असरदार दिखाई देती है।

दो घरों को जोड़ कर बन जाता है इक रिश्ता
पति पत्नी में आजकल तकरार दिखाई देती है।

जिसे चाहा उसने ही दूध में मख्खीसोच निकाला
अब तो मुझे किस्मत ही गुनाहगार दिखाई देती है।

जिसे देखो वोही यहाँ चर्चा में रहना चाहता है
सच पूछो मुझे जिन्दगी इश्तहार दिखाई देती है।

क्या पूछें किसको पूछें मुझसे क्या वो चाहता है
मेरी हाँ सौ सही उसकी इन्कार दिखाई देती है।

लोग कहें हमारा रिश्ता अब हो गया है बेमानी
मुझको भी तो अब इसमें दरार दिखाई देती है।

रोज रोज के इन हमलों से सेना संग है देश दुखी
इस मक्कारी में युद्ध की टंकार दिखाई देती है।

आ गया है वक्त अब दुशमन को मजा चखाने का
बुरा वक्त है दुश्मन का नहीं हार दिखाई देती है।

फूलों की सुगन्ध उड़ी या गंध है टूटे सपनों की जीवन कीअब हर घड़ी अंधकार दिखाई देती है।

सपने गर यह सच होते हम सोये ही रहते सदा
निराश मुझे अब जिन्दगी भार दिखाई देती है।

सुरेश भारद्वाज निराश
धौलाधार कलोनी लोअर बड़ोल
पीओ दाड़ी -धर्मशाला हिप्र.
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