कविता/राम भगत नेगी

बरसात की बूँदें

बरसात की बूँदें
जोड़ती है नदी नाले

तोड़ती है खेत ख्लीयान
सड़क रास्ते और मैदान

कहीं बाढ़ तो कहीं सुखा
बरसात में कईयों का दिल दुखा

सीलन ऐसी की फिसलन
माटी की सुगन्ध ऐसी मोर भी नाचे

त्राहि त्राहि मचा है कहीं पर
बरसात ने हर और डेरा जमाया है

देव देवताओं का मिलन
अमरनाथ शिव केलाश के दर्शन

कांवरियों की टोली जय कारा के साथ
बूंदों में भीगे सब भक्त एक साथ

बरसात की बुंदे विनाशा भी वरदान भी
दो दिलों का मेल मिलाप भी प्यार भी

नेता अफसर का जेब गीला फ़िर से
बहना है अब बरसात का नुकसान जो बताना है

बरसात की बुंदे राम भगत देख रहा है और भीगी बरसात के बूंदों में अपनी तलाश को खोज रहा है

राम भगत

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