छेड़ती हैं तिरंगें कई मन में संगीत
उठता है मसला जब कोई दिमाग में,
बोलता छन्द, कविता, रचना कोई,
गज़ल सुनाता कोई खास राग में ।।

चल पड़ती हैं विचारों की महफिलें,
ऩिकलते हैं कई सुर ताल में,
अपनी अपनी ताकत सब झोंकते,
तमाशदीन हुये बैठे सरकार में।।

पहले पहल सबका जोश,
लगता है एक ही विचार में,
दिखती किरण जब उम्मीद की,
बंट जाता कुनवा तार तार में।।

मुकम्मल मुद्दा रह जाता पीछे,
वाहवाही के ही प्रचार में,
जोश होश पीछे रह जाते सब,
बदल जाती दोस्ती कहीं ख़ार में।।

निकलता है आगे पी कर यह जहर,
सफलता पा लेता है काज़ में,
सारी बातें खरी खरी ही मिलती,
मिलता नहीं खोट कोई हिसाब में।।
जग्गू नोरिया