निकले हैं जो खा कर कसम, गरीब को न्याय दिलवाना है।
बस नहीं हरेक का,कदम कदम पर साथ चल पाना है।।

बहुत चले बहुत हटे बहुतों ने कदम आगे बढ़ाना है।
बहुतों की बदलेगी किस्मत भी कल, भेद अनजाना है।।

पथ जो चुना है बहुत कठिन और खड़ग की धार है।
अन्जाम की परवाह करते नहीं ,कर्म करते जाना है।।

बहुत जख्म मिलते हैं यहाँ टेड़ी डगर न ठिकाना है।
पग पग पर दुश्मन बना लिये ,वसर न ठिकाना है।।

बहुत कुछ पा कर ठोकर मार कर निकले हैं पथ पर।
धूप न प्यास -भूख न अहसास,दर्द सीने में दबाना है।।

तंज कोई कसे या कहे पागल फर्क नहीं पड़नेबाला है।
भस्म हो जायेंगे जनहित में , गीत यही गुन गुगाना है।।

जिसने की फिकर औलाद ,भूले फर्ज जो निभाना था।
सुनता हूँ हाल उनका भी ,जग्गू, दर्द भरा अफ़साना है।