शर्मसार*

हिमप्रांत की
पावन धरा को,
दरिंदों ने शर्मसार
किया है….
मानवता की अस्मत को
कुछ जल्लादों ने मिलकर
तार-तार किया है….

मासूम बिटिया
थी वो,
निकली थी जो
अपने घर से,

नादान
वो,
अनभिज्ञ किसी अनहोनी
के डर से….

घात लगाए बैठे थे
उसकी राह में
कुछ
आदमखोर…
समक्ष उन पिशाचों के
चलता भला
क्या उसका जोर..

देख उन दरिंदों की कुमंशा
वो बेचारी
मदद हेतू
चीखने-चिल्लाने लगी..
झपट पड़े बन भेड़िए
सब उस पर,
मानवता दूर खड़ी होकर
अश्रु बहाने
लगी…

टांग-बाजू तक
तोड़ डाले उसके,
क्रूरता की हर
सीमा को पार किया..

हिमप्रांत की
पावन धरा को,
दरिंदों ने शर्मसार
किया है….

मनोज कुमार ‘शिव’