कविता/उत्तम सूर्यवंशी

“हाँ मैं ग़रीब मज़दूर हूँ ,मगर क्यों हूँ ”
” ये सुन लो यों हूँ ”
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रोज़ बहुत दूर पैदल जाता हूँ ,
जा कर बहुत कमाता हूँ ,
मिलता मुझे सिर्फ़ दिलासा’
ओर ख़ाली लौट आता हूँ ….!!

ये बड़े बड़े विधुत घर’
ये बडी बड़ी इमारतें ‘
ये सड़कें आदि …..
पहाड़ चीर के बनाता हूँ …!!

ठेकेदार गाड़ियों में आते जाते
ओर मैं दिन भर थक कर भी
पैदल अपनी झोंपड़ी की ओर आता हूँ ,
कोई मुझे प्यार से नहीं देखता’
ओर न प्यार से बोलता है,
क्योंकि मैं ग़रीब मज़दूर कहलाता हुँ ..!!

जब मेहनत का हिसाब माँगता हूँ
थोड़ा सा थमा दिया जाता है,
ओर निराश लोट आता हूँ ,
इतना कमा कर भी पुरा ..
हिसाब नहीं ले पाता हूँ ,
ग़रीब हूँ डरा धमका
मना लिया जाता हूँ ……!!

कभी कभी मैं खेती में,
भी लग जाता हूँ,
कड़ी धूप में मेहनत करते करते
ख़ून पसीना एक कर जाता हूँ
पर जब फ़सल तैयार होती
तो अच्छा दाम नहीं मिल पाता
ओर खेतों में भी मेरी
मेहनत का सड़ जाता
कभी मैं रोता हूँ , तो
कभी मैं मर जाता हूँ कोई ‘
नहीं सुनता फ़रियाद मेरी
क्योंकि मैं ग़रीब मज़दूर कहलाता हूँ ..!!

मुझ पर मुक़दमा बना दिया जाता है
जब में अपने हक़ के लिऐ खड़ा होता हूँ ,
दौलत वाले क़त्ल करके भी छूट जाते हैं
ओर मैं वेगुनाह होकर भी
कारगर में पड़ा होता हूँ ……..!!

सबसे ज़्यादा मेहनत करता हूँ ,
दिन रात कमाता हूँ ,
फिर भी मेरी मेहनत मार दी जाती
ओर मैं रोटी के लिये भी तरस जाता हूँ
कोई नहीं सुनता मेरी क्योंकि
मैं ग़रीब मज़दूर कहलाता हुँ ..!!

दुसरों को महल बनाता हूँ
सबके लिये अन्न उगाता हूँ ,
ख़ुद भूखे खुले आसमान
तले सो जाता हूँ ,
सब ठोकर मारते हैं ,
ग़रीब मज़दूर जो कहलाता हूँ …!!

मेहनत की पर फ़रेब न किया
ईमानदारी निभाने में ,
कोई परहेज न किया,
सबको खुश रखता हूँ ,
फुटपात पर रह कर भी
पूरे देश को शुद्ध रखता हूँ …!!

सबने शोषण ही किया मेरा
मगर ..मैं फिर भी सबको
प्रणाम करता हूँ ,
कोई भी हो कैसा भी हो
सबका सम्मान करता हूँ ..!!
मुझको दिया जाऐ सही मेरा ‘हक’
सरकार से मैं ये माँग करता हूँ ….!!

उत्तम सूर्यावशी !
गाँव तलाई डा.किलोड’
ते. सलूनी ज़िला चंबा (हि.प.)!
पिन कोड..176320
मो.न. 8629082280

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