कविता – हिंसक भेड़िये

जंगली हिंसक भेड़ियों के
साम्राज्य की
सीमाएं लांघती वह
महफूज रही हमेशा ही
उदर अग्नि बुझाने को आतुर
नरभक्षी जानवरों के डर
और आशंकाओं के बीच भी l

पिता के झुकते कन्धों की
जिम्मेदारियों को
वह चाहती थी बाँटना
बनकर अफसर बिटिया
माँ की थी मानो परछाई
उसकी नज़रों में
एक सफल भावी गृहणी l

डरावने जंगलों का खौफ पाले
वह हो गई थी निर्भीक
अनजान थी वह
इंसानी हिंसक भेड़ियों के
उस झुण्ड से
जो टूट पड़ा था उसे नोचने
हैवानियत, पशुवृति
और दरिंदगी की
चरम सीमाओं को लांघ कर l

उसकी चीख पुकार से
सहम गए होंगे देवदार
वह चाहती थी जीना
गिडगिड़ाती रही वह
दरिंदों के समक्ष
मगर वे हो गए थे
अंधे और बहरे
वहशीपन की तृष्णा में l

न्याय की इबारतों में
अपराधियों के लिए
सुनाई जाएगी कड़ी सजा
मगर क्या
गुड़िया के कातिलों को
दी जाने वाली सजा
दिला पायेगी उसे न्याय
यथार्थ में ही !

या फिर
जरूरत है आज
समाज के उस रुग्ण अंग की
गहन और गंभीर
शल्य चिकित्सा करने की
जो फैला रहा है जहर
जहरीले सांप के
दंश की तरह ?

(04 जुलाई, 2017 को हिमाचल प्रदेश के जिला शिमला के कोटखाई में हुए गुड़िया गैंगरेप और हत्याकांड से आहत होकर लिखी गई रचना l

मनोज चौहान
BharatKaKhajana (http://www.bharatkakhajana.com