दोहे:–
अजब-ग़ज़ब संसार सब, अजब-ग़ज़ब हैं लोग।
भोग न हों पूरे कभी, फिर भी फिरते भोग।।
काम-पिपासा घेरती, गिरते बारम्बार।
अपना आप गँवाय के, बन रहे होशियार।।
विषमलिंग की चाह में, भूले अपना आप।
जोर-जवानी जब गई, होता है संताप।।
खान-पान दूषित हुआ, दूषित हुआ विचार।
विश्व-विजय की लालसा,खुद से जाते हार।।
औरों के आगे बनें, सारे चतुर सुजान।
दुनिया भर का ज्ञान है,अपनी ना पहचान।।
रोज़ कुसंगत छोड़ते, मुड़-मुड़ धरते ध्यान।
आकर फिर गिरते वहीं, होती रही थकान।।
अपना आप खपाय के, मुड़ना हो दुश्वार।
जन्म-जन्म यह सिलसिला, चलता बारम्बार।।
इच्छाएँ पाली घनी, घेर रहीं घनघोर।
पूरी न हो पाएँगी, ठगा गया चितचोर।।

नवीन शर्मा ‘नवीन’
गांव/पत्रालय-गुलेर
तहसील-देहरा गोपीपुर
जिला-काँगड़ा (हि.प्र.)
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