ग़ज़ल/धीरज गर्ग

तेरे प्यार में आईना हो गया
आयत की कोई दुआ हो गया

मुकम्मल हुये हैं मुकाम सभी
तू जो मेरा यूं रहबरा हो गया

मीलों का था जो दरमियां
अब वो फ़ना दायरा हो गया

हर इक बात की खुश्बू सीने में
तेरी गुफ्तगू का यूं नशा हो गया

बेचैनियों में यूं चाशनी घोले तू
तू मर्ज और तू ही दवा हो गया

रूहों से इश्क है इबादत जैसी
तेरी रूह मेरा आशियां हो गया

ये लफ्जों का काफ़िरपन बेवजूद
सच लिखना जैसे गुनाह हो गया

ये हुनरे कलम ये गजल है सिफ़र
कलमनामा फक़त इक अदा हो गया

धीरज गर्ग

One comment

  1. सच लिखना जैसे गुनाह हो गया…… क्या बात है… बहुत खूब..

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