कहानी”

घोष बाबू अपनी अधेड़ावस्था के दिनों में दैनिक विद्यालयीय दिनचर्या से उकता से गए थे। प्रतिदिन डिब्बे में दोपहर का खाना लेकर सात किलोमीटर तक साईकिल खींचकर गंगा पार करके विद्यालय पहुँचना, पूरा दिन बच्चों के साथ मगज मारते-२ कब पच्चास की अवस्था पार हो गई पता ही न चला। एक ओर जहाँ उनके शिष्य बड़े-२ पदों पर पहुँच चुके थे और किसी बड़ी गाड़ी को रोककर उनका अभिवादन करते हुए अहसास कराते कि मास्टरजी बहुत विशेष व्यक्ति हैं वहीं दूसरी ओर अपनी खटारा साईकिल की उतरी हुई चेन चढ़ाते बाबू घोष के कानों में श्रीमतीजी का कातर स्वर कौंध जाता कि “घोष बाबू जीते जी माँ वैष्णो के दर्शन तो करा दे।”
बेटी कल्याणी में ब्याही थी, दामाद फौज में नायक है, एक दोहता है। बेटा अभी काम पर नहीं लगा, कलकत्ता विश्वविद्यालय से अभी-२ एम० ए० की पढ़ाई पूरी की है। बैरकपुर गंगाघाट तक चार किलोमीटर दूरी पर छोटा सा मकान जिसकी छत से रिसता हुआ धुँआ आकाश में विलीन हो जाता है और जहाँ से प्रतिदिन बूढ़ी साईकिल पर सवार होकर नाव पार करके फिर से साईकिल जिसमें ग्रीसिंग नहीं होने के कारण विविध ध्वनियां निस्सरित होती हैं तथा स्कूल प्रांगण तक और दो किलोमीटर चलाकर जाते हैं। नाववाला और सवारियां सभी उन्हें सम्मान देते हैं।
अपनी अम्मा की हसरत बेटी द्वारा अपने पति से सांझा करने पर उसने तीन टिकट सियालदह एक्सप्रेस के स्लीपर क्लास में बुक करवा दिए थे, और जम्मू में तैनात होने के कारण आश्वस्त किया था कि वह जम्मू रेलवे स्टेशन पर उन्हें मिल जाएँगे। घोष मास्टरजी ना नुकुर करने के बाद इस शर्त पर राजी हुए कि दामाद द्वारा किया हुआ व्यय वापस किया जाएगा।
जनेऊ की जोड़ी, गंगाजल और पूजा का आसन अपने साथ लेकर ही कहीं बाहर जाते थे। शेष तैयारी माँ बेटी ने मिलकर की। मुकुल घोष उनका बेटा घर पर रहा। नियत दिन पर यात्रा शुरु हुई। सबकुछ आनंद से व्यतीत हुआ। नीचे के दो बर्थ माँ बेटी को दे दिए और स्वयं दोहते के साथ बालक्रीड़ा करते हुए ऊपर वाली बर्थ पर लेट गए। दिल्ली तक सफर अच्छा रहा। दिन में कुछ लोग बिना रिजर्वेशन भी डिब्बे में चढ़ जाते किंतु रात में सब ठीक रहता। लेकिन दिल्ली में यकायक बहुत से लोग जो दिन भर काम करके अकसर पानीपत-सोनीपत व कुरुक्षेत्र आदि तक यात्रा करते हैं, रेलगाड़ी में चढ़े। सभी डिब्बे खचाखच भरे हुए थे।
श्रीमती घोष और उनकी बेटी को उठाकर कुछ लोग वहाँ बैठ गए थे। घोष बाबू ने सोचा शायद कल की रात की तरह आठ बजे तक सब सामान्य हो जाएगा, लेकिन वहाँ भीड़ बढ़ती गई। बैठे हुए कामगारों के साथी जो खड़े थे वे भी धीरे-धीरे बैठ गए। यह इन लोगों का रोज़ कका काम है और लंबे सफर के यात्रियों को सब झेलना ही पड़ता है, उनकी पत्नी और बेटी बामुश्किल बैठ पा रहींथीं। ऊपर से घुटनों पर ब्रीफकेस रखकर ताश खेलना, चिल्लाकर बात करना और गाली गलौच भी, सफर असहज हो गया। विनीता बेटी ने अपने बेटे को नाना के पास थमाना उचित समझा। वह बेटे को ऊपर बर्थ पर लेटे मास्टर घोष के पास पकड़ा कर बैठने लगी तो उसकी जगह और तंग हो चुकी थी। बैठ पाना लगभग मुश्किल हो चुका था, ऊपर से बत्तमीजी भरी बातें असह्य थी। रात के लगभग दस बज रहे थे। घोष बाबू के सीट खाली करने के आग्रह पर सभी मिलकर उन्हें डराने धमकाने लगे थे। सामने साईड वाली बर्थ पर एक दंपत्ति लेट रहा था, शोर सुनकर वह व्यक्ति उठा और इन मुशटंडों के साथ उलझ गया। उसने बताया कि वह जैक राईफल का सैनिक है, यदि आप लोग इस परिवार की सीटें खाली नहीं करोगे तो अगली कार्यवाही के लिए तैयार रहें, उस सैनिक की समझदारी और रुआब को देखकर सीटों पर कब्जा जमाए हुए लोग धीरे-धीरे सरक लिए और आगे की यात्रा सहज हो सकी।
घोष बाबू द्वारा कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद ज्ञापित करने पर उस बहादुर सैनिक ने कहा- “बाबूजी शर्मिन्दा न करें, हम भी किसी माँ के बेटे हैं, कोई हमारी भी बहन है और आप मेरे पिता जैसे हैं, मैने अपना धर्म निभाया।”
सच्चरित्र भारतीय सेना के सैनिकों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा पढ़ाया था बाबू जी ने ,पर आज अपने साथ हुए अनुभव ने मास्टरजी को गौरवान्वित कर दिया, उनकी आँखों की चमक में हल्की सी स्निग्धता उस सैनिक को किसी पारितोषिक की तरह प्रतीत हो रही थी। प्रात: काल जम्मू पहुँचने पर उनके दामाद ने उस सैनिक को खूब धन्यवाद दिया। श्रीमती घोष माँ वैष्णों के दर्शन करके धन्य हो गईं।

“जय हिन्द”

नवीन शर्मा ‘नवीन’
गुलेर-कांगड़ा(हि०प्र०)
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