(जगत नानी)
नाम क्या है मैं न जानूं, पर नानी सब की है वह कहलाती।
खेत में झोंपड़ डाल, परिवार संग वह है रहती।
सुबह उठकर सबको जगाए, खिलाती, पिलाती और नहलाती।
सबके संग ट्रैक्टर पर बैठ, परिवार संग है काम पर जाती।
अस्सी के पार होगी, दिल से दलेर है और रंग की काली।
सभी से हंस कर बात करे वह, सभी पुकारें नानी नानी।
काम करने में सब से आगे, है बड़े ही वह दिल वाली।
परिवार का हरदम ख्याल है रखे, सब कहते हैं हमारी प्यारी नानी।
दस पंद्रह सदस्यों की है वह मुखिया, पर अभी भी बड़ी है दुखिया।
रहने को मात्र इक कुटिया है,पानी भरने को बस इक लुटिया है।
दो चीथड़े तन पर हैं बस, मन से वह रहती प्रसन्न है।
जब देखो हंस कर बतियाती, नानी है वह सब की कहलाती।
उसके भी कुछ अरमान हैं, नागरिक भारत के सभी समान हैं।
सोचता हूँ कि उसे भी रहने को एक मकान मिले।
आराम के वहां सब सामान हों, पास उसके भी एक कार हो।
जिंदगी के सब सोपान हों, पूरे उसके भी सभी अरमान हों।
रामराज्य फिर से भारत में आए, चिड़िया सोने की फिर कहलाए।
यहां सब जन एक समान हों, गरीब न यहाँ कोई इन्सान हो।
नानी का भी नया जहान हो, और आलीशान मकान हो।
चाहे परिमल ऐसा भारत महान हो, सब की जहां एक सी शान हो।।
नंदकिशोर परिमल, गांव व डा. गुलेर
तह. देहरा, जिला. कांगड़ा (हि_प्र)
पिन. 176033, संपर्क. 9418187358
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