सुखद एहसास होता है, जब कोई अपनों के पास होता।
वरना टलतीे रही मुलाकात, बहाने अजव बनाते रहे हैं।।

तमाम उमर गंवा देते, चन्द सिक्के पाने की चाहत में,
भूल मोल जीवन का , अमोल रिश्ते युँ भुलाते रहे हैं।।

सोच समझ जरा देखो , रौव जमाने पर अजमाते कैसा,
सुविधा दे नहीं पाते , जनता पर चावुक चलाते रहे हैं।।

कहाँ की पढाईयाँ, कहा सीखे प्रशासन चलाने का हुनर,
सोध का विषय है आज, नासमझी वोह दिखाते रहे हैं।

सोई जनता झेलती जाये, कोई आवाज नहीं उठाता है,
कैसे सवक सिखाऊँ ,जग्गू, अफसरों को, जुर्म जो ढहाते रहे हैं।।