घाटी के नमकहरामों
घाटी के नमक हरामों, शर्म करो कुछ शर्म करो।
जिस थाली में तुम खाते, उसमें मत छेद करो।
खाते माल भारत देश का, गुण गाते पाकिस्तान का।
पाकिस्तान की भांति ईमान धर्म नहीं तुम सबका।
यह कैसी नेतागिरी, अपने बच्चों को अच्छे संस्थान में पढ़ाते।
पिच्छलग्गु निरीह लोगों को पत्थरबाजी को हो उकसाते।
देश के कैसे नुमांइदे हो तुम, तुम पर देशवासियों को शर्म है आती।
एक मुंह से दो दो व्यानोंपर, तुम्हें शर्म क्यों है नहीं आती।
घाटी से पंडित भाईयों को भगा कर लाज तुम्हें क्यों न आई।
कश्मीर हम सबका है, तुम तो देते पाकिस्तान की दुहाई।
गर पाकिस्तान से प्यार तुम्हें है, जाओ भागो वहां चले जाओ।
जो तुम्हें यहां नहीं मिल पाया, वहां जा कर अपना मन बहलाओ।
रहना है भारत में तो, संविधान यहां का सब पहचानो।
संविधान के भीतर रह कर ही, जीवन यापन जीना जानो।
देश के वीर जवानों को धोखा देकर, कैसी सियासत तुम करते हो।
ऊपर से सफेदपोश बने हो, अंदर से अति स्याह अति काले हो।
लानत है अति तुम्हारी मानवता पर, किस माटी से तुम बने हो।
कथनी करनी में तुम्हें अंतर नहीं दिखता, कैसे पशु सम तुम मानव हो।
तुम से तो कबूतर – बंदर – कुत्ता अच्छा, देशभक्ति का पाठ पढ़ाता।
तुम्हारा तो कोई मजहब नहीं है, छेद वहीं करता
जिस बर्तन में खाता ।

परिमल शर्म शर्म है तुम नमक हरामों पर।
चुल्लू भर पानी में अब तुम डूब मरो।।

नंदकिशोर परिमल
सेवा निवृत्त प्रधानाचार्य
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