कविता / डॉ प्रत्यूष गुलेरी

मत्लब तक
डा प्रत्यूष गुलेरी
मत्लब तक लोग मत्लब रखते हैं
मत्लब निकल गया तो
मत्लब भी गया
आया राम गया राम की तरह
और फिर तुम मत्लब के बिना
यों ही फेंक दिए जाओगे
ज्यों आम चूस कर
गुठली का क्या मत्लब?
नहीं तो दाल में पड़ी
मक्खी की तरह
दाल से बाहर कर दिए जाओगे
रिश्तेेेदारों में,दोस्तों में
और सार्वजनिक जीवन से
अथवा साहित्यिक मित्रों से भी
खारिज़ कर देने की साजिशें हरमुमकिन
चौतरफा रची जाएगी
अपने ही लोगों से
अपनों से भी बड़ा साबधान
रहना ज़रूरी है लोकतंत्र में
आमजन की तरह ही
लोकतंत्र के नाम पर ही
हम क्या क्या नहीं कर जाते हैं
निगल जाते हैं,गटक जाते भी
सोचो तो तनिक
देश को अंबर तक पहुंचाते हैं
मरसिए तक पढ़ते पढ़ाते हैं
चट कर जाते हैं
हाय राम!
क्या कुछ नहीं?

कीर्ति कुसुम, सरस्वती नगर,पोस्ट दाड़ी176057
धर्मशाला,हिमाचल प्रदेश।

2 comments

  1. चट कर जाते हैं.. क्या कुछ नहीं…… क्या बात है… शानदार..

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