शिकायत पर चन्द पंक्तियाँ।।

चुरा लेने दो आदत है जिन्हें चुराने की,
कम नहीं होती शान युँ कवि घराने की।।

सामना होता है जब कभी महफिल में,
बीत जाती हैं घड़ियाँ हसीं ऐव छुपाने में ।।

शब्द शिल्पकार घड़ लेते कवितायें नई,
नाकाम रहते वोह लगे रहे जो चुराने में।।

शिकायत होनी चाहिये हरगिज़ उनकी,
मति लगी जिसकी कवि नाम मिटाने में ।।

कह गये स्याने नींद बिस्तर नहीं देखती,
होती नहीं मंजिल नसीव गैर ठिकाने में।।

खुश रखना सबको कवियों का खेल है,
विश्वास नहीं रखते किसी को रूलाने में।।

बात बात में बात कह जाते ऐसे ,जग्गू,
लगता माहिर बहुत हैं भेद खुलवाने में।।
जग्गू नोरिया