न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को

न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को।
सीखा दे सबक उन बिगड़ी हुई औलादों को।।

उनके उबले हुए गर्म खून को जमा दे।
तड़प-तड़प मिटे हस्ती सबक ऐसा सीखा दे।
गुनाह करने से पहले काँप उठे रूह,
ऐसी सज़ा दे उन साहबज़ादों को।
न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को।
सीखा दे सबक उन बिगड़ी हुई औलादों को।।

बच्चे तो थे नहीं जो गुड़िया से खेल गए।
क्या समाधि में थे जो उन्हें तुम झेल गए।
हे खुदा! ले लेते हैं जो हैवानियत का रूप,
फना क्यों नहीं करते उन गलत इरादों को?
न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को।
सीखा दे सबक उन बिगड़ी हुई औलादों को।।

चले हैं जो कच्ची कलियों की बोटियाँ नोचकर खाने,
सरहदों पर क्यों नहीं जाते दुश्मनों को मिटाने?
सीधा चलते हैं पर मारते हमेशा तिरछा,
कर दो भस्म शतरंज के ऐसे प्यादों को।
न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को।
सीखा दे सबक उन बिगड़ी हुई औलादों को।।

गैंगरेप करके कत्ल आज क्यों आम हो गया?
लोकतंत्र ही यारो पैसों का गुलाम हो गया।
गूँजने से पहले ही किया करो दफन,
इन पापी वहशियों की नादों को।
न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को।
सीखा दे सबक उन बिगड़ी हुई औलादों को।।

द्वापर युग में तो तूने द्रोपदी को बचाया,
फिर कलयुग में क्यों इंसान तेरा न बन पाया?
कब तक कराहता रहेगा ज़माना दरिन्दों के दर्द से?
हे खुदा कब सुनेगा तू ‘भारती’ की फरियादों को?
न बख्श खुदा उन हैवानों को जल्लादों को।
सीखा दे सबक उन बिगड़ी हुई औलादों को।।
सुशील भारती, नित्थर, कुल्लू (हि. प्र.)
मो. 9816870016