ग़ज़ल

हमने जख्म नासूर होते हुए देखे है
अपने खुद से दूर होते हुए देखे है

देखे हैं मिटते हुए निशां मंजिलों के
पैर थक कर चूर होते हुए देखे हैं

पूछता नहीं था जहाँ में जिन्हे कभी कोई
अपने आप वोह मशहूर होते हुए देखे है

जिन्हें हमारी चाहत ने सब कुछ दे दिया
बोही हमने मगरूर होते हुए देखे है।

लूट लिया जिन्होंने हमारा चैनोस्कून
बोही हमने बेकसूर होते हुए देखे है।

सजदे में रहते थे जो झुक कर खड़े
बोही हमने अब ‘हजूर’ होते हुए देखे है।

नफरती फिज़ा में थे जो आँख की किरकिरी
सबकी आँख का वो नूर होते हुए देखे है।

जिनको देखना भी ग्वारा नहीं था निराश
अब दिल का वो सुरुर होते हुए देखे है।

सुरेश भारद्वाज निराश ♨