कविता/ बी पी ठाकुर

प्रकृति की कलाकारी,
बड़ी प्यारी,
मंद हवा से झूलती,
डाली,
लगती प्यारी सी नर्तकी।

टप टप करती ,
वर्षा की बूंदें ,
लगती मनोहारी से,
संगीत की धुनें।

श्वेत रंग ओढ़े पर्वत,
लगते ,
किसी अदृश्य चित्रकार,
के चित्र हुए तैयार।

बर्फ के श्वेत फाहे,
जैसे,
किसी ने आसमान से,
कुछ रचने के लिए हैं ,बरसाए।

नदियां, झरने,
इनके क्या कहने,
सुनाते मनमोहक तराने।

जीवंत सी लगती,
वृक्षों की मंद हवा,
और,
शीतल छांव।

हिमाच्छादित उंचे पर्वत,
हरित गहरी घाटियां,
प्रकृति ने रची है,
मनभावन कृतियाँ।

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