कविता/ जग्गू नोरिया

मन उच्चाट है ,
भूख रही न प्यास है,
किस कदर बदनाम किया,
हर शहरी आज ह्रास है।।

वोह नौकर प्रदेश के,
बदले क्युँ उनके स्वभाव हैं,
दरिन्दे कब से उनके हुये,
करने लगे जो उनका बचाव हैं।।

ऐसा तो प्रदेश न था,
धर्म जिसका शाँत स्वभाव है,
किसकी शय में पले दरिन्दे,
यह भी जानना हमें आज है।।

बदलेंगे अधिकारी कर्मचारी,
सही नहीं लगता यह प्रयास है,
बर्खास्तगी एक मात्र सजा कौताही,
यह समय की जरूरत और पुकार है।।

खून पसीना जनता बहाती,
मोटी लेते नौकर पगार हैं,
नखटुऔं को बाहर करो तन्त्र से,
जनता माँगती यही अधिकार है।।

सब जगह निकम्मों के ढेरे,
जुल्म ,हत्याऐं ,नशे वन में लाश है
काविल अधिकारी नेताओं ने घेरे,
वेतुके व्यान असहनिये अल्फाज़ हैं।।

कौन कहेगा चलाना प्रदेश,
किसका जिम्मा किसका काज़ है,
कैसे शान्त होगा लोगों का गुस्सा,
#गुडिया को दिलवाना इन्साफ है।।

जग्गू नोरिया

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