ग़ज़ल/डॉ कंवर करतार

ग़ज़ल

अगर दिल से कभी पूछा शिकायत और हो जाती I
सदा दी होती जो तुमने शरारत ओर हो जाती II

नकावें पहन कर जिन पर हैं बरसाते कोई पत्थर ,
वयां तुम करते दुख उनका हिमायत और हो जाती I

कहो जालिम जमाने क्यों मुहव्वत करने वालों पर?
अकेले सुवकने से ही कयामत और हो जाती I

बड़ा रहम-ओ-करम वाला तो मुर्शिद है मेरा यारो ,
पुकारा दिल से होता गर सदाकत और हो जाती I

मुझे तो होश में लाकर भी क्यों ना मुस्कराए तुम?
जहां सब कुछ हुआ इतनी इनायत और हो जाती I

दिया होता जो चलना बेटियों को अपने पांवों पर,
न होता वितकरा उनसे रिवायत और हो जाती I

रखा था क्यों छुपा कर प्यार दिल में उनसे यूं ‘कंवर’ ?
अगर इजहार करते तो नफ़ासत और हो जाती I

डॉ. कंवर करतार
‘शैल निकेत’ अप्पर बड़ोल
धर्मशाला हि.प्र.
9418185485

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