ग़ज़ल / संजीव कुमार सुंधाशु

गजल
अपने को उनके विश्वास के काबिल बना न पाए,
अपनी ही कुछ बुराइयों को शायद मिटा न पाए |
हमें तो जीने की वो राह दिखाई है उसने,
वक्त भी जिस पर कदमों के निशां मिटा न पाए |
हमें हमसे मिलाने की मेहरबानी की उसने,
एक हम हैं कि एहसान भी जता न पाए |
सुना है इश्क़ में रूहों का मिलन होता है,
मगर हम दीद की हसरत मिटा न पाए |
वो गमों का समन्दर जब्त करते रहे,
हम दुख का एक अश्क भी छुपा न पाए|
हमारी वफा में जरूर कुछ कमी थी सुधांशु,
जो खुद को उनकी जगह कभी बैठा न पाए |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डाकघर च्वाई
त. आनी जिला कुल्लू
172032

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