ग़ज़ल / भगत राम मण्डोत्रा

गजल
जाकर सरहद पर लड़ता है कोई कोई।
वीर बहुत हैं पर मरता है कोई कोई।।

बन कर वीर सिपाही चितकबरी बर्दी में।
जान हथेली पर धरता है कोई कोई।।

स्वार्थ की खातिर किए गए काम भलाई के।
पुण्य तो हैं, पर सरता है कोई कोई।।

होता घोर गुनाह, दिल दुखाना किन्हीं का।
जानते हैं सब, पर डरता है कोई कोई।।

हमदर्द सभी बनते हैं, महलों में रह कर।
दीन दुखी से जा, रलता है कोई कोई।।

क्या तारीफ करें कलयुग के गुरु शिष्यों की?
द्रोण अर्जुन को, घड़ता है कोई कोई।।

कसमें खाने का अमली को होता चस्का।
नशे की आदत को, तजता है कोई कोई।।

प्रजातन्त्र उपहास बना नेताओं का।
पाकर वोट याद, रखता है कोई कोई।।

मां बाप से बढ़कर साहूकार कहां होगें?
ऋण लेते हैं सब पर, भरता है कोई कोई।।

इश्क का दरिया किंचित गहरा है ‘भगत’।
कूदते तो सब पर, तरता है कोई कोई।।

भगत राम मंडोत्रा
‘कमला कुटीर’ गांव – चम्बी,
डाकघर – संघोल, तहसील – जयसिंहपुर,
जिला – कांगड़ा (हि. प्र.) – 176091

4 comments

  1. आदरणीय आशीष बहल जी, मेरी उपरोक्त गज़ल में निम्नलिखित दो सुधार करने की कृपा कीजियेगा:-
    पहला : लाइन नंबर 16 में “रखता” की जगह करता करें अर्थात
    ‘प्रजातन्त्र उपहास बना नेताओं का।
    पाकर वोट याद, करता है कोई कोई।।’

    दूसरा : आखिरी पंक्ति में “तो” के स्थान पर “हैं” करें अर्थात
    ‘इश्क का दरिया किंचित गहरा है ‘भगत’।
    कूदते हैं सब पर, तरता है कोई कोई।।’

    धन्यवाद।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *