गजल
जाकर सरहद पर लड़ता है कोई कोई।
वीर बहुत हैं पर मरता है कोई कोई।।

बन कर वीर सिपाही चितकबरी बर्दी में।
जान हथेली पर धरता है कोई कोई।।

स्वार्थ की खातिर किए गए काम भलाई के।
पुण्य तो हैं, पर सरता है कोई कोई।।

होता घोर गुनाह, दिल दुखाना किन्हीं का।
जानते हैं सब, पर डरता है कोई कोई।।

हमदर्द सभी बनते हैं, महलों में रह कर।
दीन दुखी से जा, रलता है कोई कोई।।

क्या तारीफ करें कलयुग के गुरु शिष्यों की?
द्रोण अर्जुन को, घड़ता है कोई कोई।।

कसमें खाने का अमली को होता चस्का।
नशे की आदत को, तजता है कोई कोई।।

प्रजातन्त्र उपहास बना नेताओं का।
पाकर वोट याद, रखता है कोई कोई।।

मां बाप से बढ़कर साहूकार कहां होगें?
ऋण लेते हैं सब पर, भरता है कोई कोई।।

इश्क का दरिया किंचित गहरा है ‘भगत’।
कूदते तो सब पर, तरता है कोई कोई।।

भगत राम मंडोत्रा
‘कमला कुटीर’ गांव – चम्बी,
डाकघर – संघोल, तहसील – जयसिंहपुर,
जिला – कांगड़ा (हि. प्र.) – 176091