ग़ज़ल/संजीव कुमार सुधांशु

गजल
इन्सानियत बिक रही है बाजारों में,
सनसनी बिक रही है अखबारों में |
बेहाल है किसान और मजदूर,
तरक्की हो रही है इश्तिहारों में |
वो जिन्हें खौफ था लहरों का,
कारवां छोड़ खडे रहे किनारों में |
अबके जमीन पर कुछ कर गुजरना होगा,
आखिर कब तक भरमाओगे नारों में |
रंग, पटाखे, दीये, जाने क्या क्या चीनी,
वो मजा नहीं रहा अब त्योहारों में |
ऐसे अटूट रिश्ते से जुड़े हैं हम तुम,
जो रिश्ता है नदी के किनारों में |
देखते रहे जो तमाशा उसकी मौत का,
उनका भी नाम होगा उसके हत्यारों में |
कुछ बेटियाँ कोख में दफन कर दी गई,
सुना है अबसे फूल नहीं खिलेंगे बहारों में |
जरूर कुछ गुल खिलाये हो सुधांशु,
चर्चे होने लगे हैं बाजारों में |
संजीव कुमार सुधांशु
गांव व डाकघर च्वाई
त. आनी जिला कुल्लू
हि. प्र.
172032
फोन -94182-72564

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