ग़ज़ल/राम भगत नेगी

आईने में जब देखते है ….
आईने में जब देखते है खुद को
बहुत सारे सवाल मन में आते है

कितने सारे खुशी आँसू
जीवन में मिलते है

और हम सब मुसीबतों से नीकल कर
मंजिल के करीब आते है

बहुत बड़ी है दुनियां
रस्मों रिवाजों से बँधा ये ज़माना

कोई खुद को बना लेता है
कोई खुद को मिटा लेता है

रंगीन है ये दुनियां पता नहीं
कब कौन सा गुलाल जीवन में पड़े

उतार चढ़ाव हँसना खेलना
दुख सुख जीवन का चक्र है

जो इस चक्र से निकला वो संत बन गया
और जो इस चक्र में फँसा वो रंक बन गया

मत ऊल्झो ज़माने से तुम
ज़माने के साथ जीना सीखो

यहाँ प्यार दोगे प्यार मिलता है
कांटे दोगे तो कांटे ही मिलेगा

जीवन में सब छूट जाते है
रह जाती है सिर्फ नीली छतरी वाली दुनियां

राम भगत

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