गजल
तूफान आएगा कुलबुलाहटें डराने लगी हैं।
वक़्त बदलने की सुगबुगाहटें चेताने लगी हैं।।

अभी भी बचा है बहुत, बचाने के लिये यारो।
कश्तियां बिखरीं नहीं, तनिक चरमराने लगी हैं।।

भूगोल बिगड़े कभी इतिहास माफ नहीं करता।
गणनायें गणित विज्ञान की गड़बड़ाने लगी हैं।।

समाज टापू टापू कर दिया ठेकेदारों ने।
पहाड़ की मानिंद लहरें सर उठाने लगी हैं।।

वो ऊपर कैसे पहुंचे, इन कंधों को पता है।
क्यों उनसे गन्धें गरूर की अब आने लगी हैं?

लाचार होकर के आज ममतामयी मां भारती।
कुपूतों को जन्म दे कर आंसू बहाने लगी हैं।।

अपनी जड़ों की परवाह नहीं तनिक भी रही कभी।
उन्हें पराये फूलों की फ़िकरें सताने लगी हैं।।

साजिशें पकने लगी हैं जमीं आसमान के बीच।
प्रलय अभी दूर सही पर आहटें आने लगी हैं।।

खोल दो हाथ जवानों के, कहीं देर न हो जाये।
जहां तहां देश द्रोही ताक़तें डराने लगी हैं।।

भगत राम मंडोत्रा
‘कमला कुटीर’ गांव – चम्बी,
डाकघर – संघोल, तहसील – जयसिंहपुर,
जिला – कांगड़ा (हि. प्र.) – 176091