ग़ज़ल/नवीन शर्मा नवीन

ग़ज़ल*
१२२२ १२२२ १२२२ १२२
उकूबत१ खूब हमको थी मिली जो दिल लगाया।
क़ज़ा२ में था यहीं कुर्बान होना सर झुकाया।।
गज़ीदा३ हुस्न ने कुछ इस क़दर है डंक मारा।
उजड़कर खुद कहा हमने किसी का घर जलाया।।

इबादत४ हुस्न की करके हुआ बदनाम देखो।
इबारत५ भूल कर हमने सदा खुद को सताया।।

इशारा हो गया होता नहीं इतिबार६ करता।
ख़ज़ाना लुट नहीं पाता लुटा जो बिन लुटाया।।

गज़ीदा७ मैं यहाँ फिरता रहा हूँ यार हारा।
गुज़ीदा८ था वफ़ा का बेवफ़ा ने है रुलाया।।

गुज़ारिश एक करता हूँ नहीं इल्ज़ाम देना।
हुआ गुमराह जिस रस्ते उसी पर है चलाया।।

गिरह९ गुलज़ार की मज़बूत है ना टूट पाए।
न गेसू१० ही हटा रुख़११ से न पर्दा ही गिराया।।

सहारा एक साकी का नहीं है और कोई।
न छलका जाम पर था जाम मयख़ाना हटाया।

न अब है आरज़ू-ए-जिंदगी१२ हसरत१३ न कोई।
कहानी है अधूरी मौत से लड़ लौट आया।।

सुकूँ१४ का एक पल कोई मयस्सर१५ हो “नवीन”।
इसी खातिर खुदा हमने नवाकर सर झुकाया।।

शब्दार्थ:-
१सज़ा,२भाग्य,३डसा हुआ,४ प्रार्थना,५ भाषा-शैली, ६ एतबार,७.डसा हुआ,८चुना हुआ, ९ गांठ,१०केश ११चेहरा,१२जिजीविषा,१३मनो-कामना,१४शान्ति,१५प्राप्त होना।

नवीन शर्मा “नवीन”
गुलेर-काँगड़ा(हि०प्र०)
९७८०९५८ै४३

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