गजल..

फुरसतें यूं कहीं गुमनाम हो गयीं
तन्हा सुरमयी फिर शाम हो गयीं

तमाम हिचकियों में था तेरा जिक्र
शब अख्तरे शुमारी आम हो गयीं

मुश्के इश्क की तुम फिजा सी हो
ये जानकर हवाऐं नाकाम हो गयीं

यूं चर्चे बाजार में हर जुबां पे होगे
अगर इश्क में तुम बदनाम हो गयीं

तुम्हारे लम्सों से खुश रह लेता हूं
जबसे इबादतें तुम्हारे नाम हो गयीं

धीरज गर्ग (हर्फजादे)
मध्यप्रदेश