ग़ज़ल/डॉ कंवर करतार

ग़ज़ल
सब ग्यानी मानी पानी भरते सत्ता के गलियारों में I
खुद्दारी होती पानी पानी सब के सब खुद्दारों में II

ऐ! लहरो तुम सम्भल के रहना दूर साहिल है तो क्या,
जोश-ओ-जुनूं वाकी अभी मेरी तो इन पतवारों में I

कलई खुली जब से लुटेरों और रिश्वतखोरों की ,
तब से मची है खलबली उन देश के गद्दारों में I

जो चोट अभी अपनी हुई है पहली देखें तो जरा ,
है दम बचा कितना अभी दुश्मन के उन हथियारों में I

अम्बर में सूरज जब से निकला उसका कोई सानी नहीं ,
ना जगमगाते हैं रहा ना रौव चाँद-ओ-तारों में I

इतिहास में वो हैं अमर जो जनता के खादिम बने ,
रुसवा सितमगर जो रहा वो खो गया अंधियारों में I

है फ़ख्र क्यों अपनी असासा फख्त यक सच्चाई पर ,
‘कंवर‘ मसीहा कैसे बनते देख जा दरवारों में II

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