चाहता हूँ मैं भी दूँ बधाईयाँ,
गले मिलूँ बाँटूं खूव मिठाईयाँ
लेकिन भूल नहीं पा रहा हूँ,
तिरंगे में लिपटी लाशें आईयाँ।।

कोशिश करता उभरूँ सदमे से,
नन्ही गुडिया की माँग पापा से,
चन्द खिल्लौने और चॉकलेट,
हटाये हटती नहीं मोरे मन से।।

पिछले ही कल फोन पर कहा,
नवबर्ष मनाने घर ही आ रहा,
लेकिन कैसा आना हुआ तेरा,
रोशन जिन्दगी में छाया अन्धेरा।।

कैसे समझुँ कौन यहाँ अपने,
जिनकी खातिर भुलाये सपने,
दो घड़ी ढाँढस दे कर चले गये,
देख!हैप्पी न्यु एयर लगे रटने।।

क्या गलती थी जरा बताना,
सीमा पर डटे संजोये थे सपने,
लिपट कर तिरंगे में गये घर,
टूटने नहीं दिये देश के सपने।।

सभी मस्त हैं अपनी खुशियों में,
दिख नहीं रही वो लाशें किसी को,
आँच न आने दी मातृभुमि को ,
हुई शहीद और छाई सुर्खियों में।।

ऐसे हाल हो गये मानवता के,
जिनको बचाते बचाते मिट गये ,
देखो नजारे उनके ख्यालों के जग्गू
मशगूल हुये कैसे जश्न ए खुशियों में।।

जग्गू नोरिया

लोहड़ी की हार्दिक शुभकमनाएँ /उत्तम सूर्यवंशी

लोहड़ी कविता/नवीन शर्मा