विलुप्ति की ओर पारम्परिक कला

वी पी ठाकुर

पहाड़ों की शान काठकुणी शैली के मकान जहाँ आज बदलते वक्त और हालात के कारण खत्म हो रहे हैं लेकिन इन्हीं मकानों में की जाने वाली परंपरागत चित्रकला विलुप्ति के कगार पर है।
विशेषकर महिलाओं द्वारा की जानेवाली यह चित्रकला काठकुणी शैली के मकानों के मुख्य द्वारों पर की जाती है। लेकिन आजकल इसमें बहुत कम महिलाएं दक्ष है । अधिकतर दक्ष महिलाएं बुजुर्ग हैं क्योंकि नई
पीढ़ी इसके प्रति उदासीन हैं । इस उदासीनता का कारण आधुनिकता के साथ वक्त और हालात है क्योंकि यह चित्रकला अभी आधुनिक स्वरूप हासिल नहीं कर पाई है। क्योंकि काठकुणी शैली में लकड़ी के मकान अब या तो खंडहर बन चुके ं हैं या कहीं कहीं इक्का दुक्का बचें हैं। इस पर शोध करके यदि इसे वक्त और हालात के अनुसार नया स्वरूप प्रदान किया जाए तो यह पारम्परिक विरासत जीवित रह सकती है।
अब काठकुणी शैली के मकान तो काफी कम बचें हैं और यह कला भी कम ही दिखती है। लेकिन कुल्लू के कई पहाड़ी इलाकों मे ं किसी भी शुभ अवसर मुण्डन, विवाह, जाप पाठ आदि के अवसर पर कमरे के जिस कोने मे ंं हवन किया जाता है उस कोने की दीवार पर यह चित्रकला अवश्य उकेरी जा ती है।जिसे देऊथा कहा जाता है।

इस चित्रकला के लिये जो सामग्री प्रयुक्त की जाती है वह प्रकृति से ही प्राप्त की जाती है। चित्रकला करने से पहले दीवार पर लाल रंग से लिपाई की जाती है। यह लाल रंग जंगलों में भूमिगत जल स्त्रोत ों के पास पाया जाता है। जिसे कुल्लवी बोली में “प्रांज़ण” (अलग अलग गांव ों में नामों में भिन्नता) कहते हैं। हालांकि अब बाजारों से ही लाल रंग लेकर प्रयोग किया जाता है लेकिन थोड़ा अंश लाल रंग का पदार्थ प्रांज़ण भी मिलाया जाता है। इसके पश्चात लस्सी मे ं पीले रंग का गुलाल मिलाकर यह कलाकृति बनाई जाती है।पीले रंग का यह गुलाल देवदार के पेड़ों से प्राप्त किया जाता है। इसे कुल्लवी बोली में पठाह कहा जाता है। स्थानीय लोग यह पीला गुलाल देवदार के पेडों से अशिवन नवरात्रों में इकट्ठा करते हैं।

कलाप्रेमियों तथा बुद्धिजीवियों को इस कला को सहेजने के प्रयास करने चाहिए ताकि एक समृद्ध समाज की समृद्ध विरासत आने वाली पीढियों तक पहुंचे।

वीपी …..कुल्लू