लघुकथा कच्ची डोर/स्नेहलता

कहानी

*

कच्ची डोर

*
बात कुछ बीते समय की है. पर ज़हन में आज भी वो वक्या हरीतिमा लिए हुए है . हॉस्पीटल में मैं अपनी बेटी को भर्ती करवाने गयी थी. साल भर की बेटी ज्वर से पीड़ित थी.
मेरी नज़र एक गेट कीपर पर पड़ी. जैसे ही डेढ बजते वो अपने टिफिन को एक थैले से इस प्रकार सावधानी से निकालता मानो कोई हीरा निकाल रहा हो खदान से.
मन कौतूहल से भरा था कि टिफिन में एेसा क्या है .नजरें मेरी उस बंद ढक्कन के खुलने के इंतजार में थी.
ढक्कन खुलते ही हैरानी .इतनी खूबसूरत रोटियाँ. करीब छ: सात की संख्या में. हर रोटी एक सी गोलाई व मोटाई लिए जैसे किसी के हाथ नहीं बल्कि मशीन से बेली व सेंकी गयी हों.
रोटी पर कोई दाग नहीं. पर पूरी तरह फूली हुई.रोटी की दोनों परतें एकदम बराबर.
आखिर मैं पूछ बैठी भैया आपके टिफिन की रोटियों में कहीं कोई दाग नहीं. आखिर कैसे सेंकी गयी होगी ये सुन्दर रोटी. उसका जवाब मैडम जी ये प्रेम की कच्ची डोर में पकी रोटियां हैं .जली हुई या दागदार कैसे होंगी. मैने कहा घरवाली की बात कर रहे हो. नहीं मायूसी के शब्द मुख पर थे. वो तो नहीं रही. *तो फिर* मेरा प्रश्न था
उत्तर एक गरीब अपंग महिला है . घिसटकर घिसटकर आयी थी रोटी मांगने. मैने कहा मै आटा दूंगा तुम मेरे व खुद के लिए रोटियाँ बना देना.गाय के कोठे में रह लेती है और रोटी बना देती है बस. आत्मीयता से भरी रोटियाँ कच्ची डोर में पकी थी.

स्नेहलता”स्नेह”
सीतापुर सरगुजा छत्तीसगढ़

3 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *