अनुभव
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लघुकथा
अजय लगभग 10 वर्षों से बस अड्डे पर छोटी सी दुकान चला रहा था बड़ी मेहनत से वह अपने घर को चलाता था ।इसी दुकान के सहारे उसने बेटी को पढ़ाया, उसकी शादी की तथा बेटे को एक निजी संस्थान से MBA करवा रहा था। आजकल बेटा छुट्टियों में घर आया था जो पिता के काम मेंकभी कभार हाथ बंटा देता था ।दुकान की जरूरत का सामान लाने के लिए अजय को कई बार बाजार भी जाना पड़ता । तब बेटा दुकान पर बैठ पिता का सहयोग कर देता हर समय कानों में एयर फोन तथा फोन पर चैटिंग पिता को नहीं सुहाते थे ।नाराज़ होते अजय कभी कभार डांट भी देते तो नाराज हो कर बेटा सुमेश एक-दो दिन खाना देने भी नहीं आता। इकलौते बेटे के लिए बाप दिन रात मेहनत करके पता नहीं कैसे-कैसे उसकी फीस ,अन्य अख़राजात आदि का प्रबंध कर रहा था ।इसका सुमेश को बोध नहीं था ।कभी कभार अगर अजय घर में बेटे को डांट देते तो सुमेश की मां पति अजय को ही निशाना बना देतीं और घर में तब व्याकरण का “स्त्रीपुंम्वच्च” सूत्र लगता।अजय चुप हो जाता बेटे का हौसला बढ़ता ही जा रहा था। एक बार मैं भी अजय के पास खड़ा बातें कर रहा था। अचानक अजय को सामान लाने के लिए मुख्य बाजार में जाना पड़ा उसने अपना कार्यभार बेटे को सौंपा कि मैं बाजा़र हो आता हूं तुम दुकान देखना मुझे भी वहीं रहने की बात कह कर अजय चला गया इतने में एक ग्राहक ने ₹10 की धूपबत्ती की मांग की अजय की दुकान पर ₹20 की धूप की बड़ी बत्ती थी। सुमेश ने एकदम मना कर दिया की ₹10 वाला धूप नहीं है ।नवरात्रों के दिन थे मेरे देखते देखते 10:00 15 मिनट में 4 , 5ग्राहक आए जिन्होंने केवल धूप की ही मांग की कि ₹10 का धूप है। उन्हें ना में उत्तर मिलता। वह साथ वाली दूसरी दुकान में चले जाते क्योंकि अजय की दुकान में ₹20 का ही धूप था ।अपना काम निपटा कर जरूरी सामान लेकर अजय अपनी दुकान पर आ गया उसने सुमेश को वहीं साथ में बैठने का आग्रह किया तथा मुझसे भी विस्तार से परिचय कराने लगा कि यह मेरा बेटा सुमेश MBA कर रहा है मार्केटिंग में ।मैंने भी खुशी जताई पर जैसे ही मेरी बात खत्म हुई वह मुझे नमस्ते कह कर तुरंत चला गया ।अजय को दुख भी हुआ। इतने में एक महिला ₹10 की धूप की मांग करते हुए अजय की दुकान में आई। परंतु ₹10 की धूप की बत्ती ना होने के कारण अजय विचलित नहीं हुआ ।अपितु उसने 20 रुपए वाली धूप की बत्ती की ओर इशारा किया ।महिला ने मना कर दिया कि 10 वाली ही चाहिए ।मुझे दुख हो रहा था कि इसके कम से कम पांच से छ: ग्राहक खाली हाथ लौट गए ,परंतु अजय ने झट से 20:00 वाली धूपबत्ती को छुरी से आधा काटा तथा महिला को थमा दिया ।मैं उसके प्रत्युत्पन्नमतित्व को देख कर हतप्रभ रह गया। देखते ही देखते उसने दूसरा हिस्सा भी धूपबत्ती का बेच डाला मैं उसके अनुभव को मन ही मन सलाम करने लगा तथा बेटे की आधुनिक पढ़ाई को उस अनुभव के आगे बहुत बौना महसूस करने लगा।
स्वरचित

विजयी भरत दीक्षित
सुजानपुर टीहरा हि.प्र.
9625141903

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